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सुशांत सिंह राजपूत का केस सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया गया है, इस पर आपका की क्या प्रतिक्रिया है ?

 

मुझे बहुत राहत मिली है, पिछले कई हफ्तों से चर्चा के लिए टीवी चैनलों पर यही एकमात्र विषय था और मैं बिलकुल तंग आ गया था. इस पर और जल्दी फैसला होना चाहिए था .

सुशांत ! सुशांत ! सुशांत ! हर चैनल पर यही शोर था . कभी-कभी, मेरा मन करता था कि इन सबको चिल्ला कर बोलूँ - शान्त ! शान्त ! शान्त ! शायद अब सब शान्त हो सकेंगे ।

इस प्रकरण और मीडिया जांच का विस्तृत कवरेज बड़े पैमाने पर रिपब्लिक टीवी द्वारा अर्नब गोस्वामी के नेतृत्व में शुरू किया गया था, जिसके बाद टाइम्स नाउ और उसके बाद सभी चैनलों ने लोगों के मूड को भांपते हुए वही किया, और जब टीआरपी का सवाल था तो कोइ पीछे क्यों रहता ?

सुप्रीम कोर्ट ने देश के लोगों की आवाज सुनी है और समझी है। इसका निर्णय सुशांत सिंह राजपूत (SSR) के फैन और उनके परिवार को संतुष्ट करेगा। 14 जून 2020 को एसएसआर की रहस्यमय मौत के बाद, कई चीजें सामने आईं, जिसने तथाकथित आत्महत्या पर लोगों के मन में संदेह पैदा किया।

प्रथम दृष्टया यह दिखाई दे रहा था कि मुंबई पुलिस सही दिशा में नहीं जा रही थी। सुशांत सिंह राजपूत के परिवार और दोस्तों के सब्र का बाँध टूट रहा था और इसलिए पूरी घटना की सीबीआई जांच की मांग की गई जिसमें दिसा सालियन की आत्महत्या भी शामिल है।

लोग अभी भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि महाराष्ट्र सरकार सीबीआई को जांच क्यों नहीं सौंप रही थी ?

सरकार के सभी गठबंधन सहयोगियों के नेताओं के बयान, संदेह करने के बड़े कारण थे . ऐसा लगता है कि सरकार किसी हाई-प्रोफाइल व्यक्ति को बचाने के की हर संभव कोशिश में लगी है .

लोकतंत्र में, अगर लोगों की सीबीआई के माध्यम से जांच करवाने की इच्छा है, तो राज्य सरकार को लोगों के विश्वास की रक्षा के लिए जल्द से जल्द सिफारिश करनी चाहिए. इससे यह भी लगेगा कि सरकार के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है.

कई लोग सवाल कर सकते हैं कि पटना में एफआईआर दर्ज करना सही नहीं था क्योंकि इस घटना का क्षेत्राधिकार मुंबई था और इसलिए सीबीआई जांच के लिए बिहार सरकार की सिफारिश को सुप्रीम कोर्ट को स्वीकार नहीं करना चाहिए था। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने बिहार सरकार की सिफारिशों के आधार पर निर्णय नहीं दिया है, क्योंकि मामले में महाराष्ट्र सरकार भी एक पक्ष थी।

यदि परिवार सीबीआई के माध्यम से जांच का अनुरोध लेकर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाता तो भी सर्वोच्च न्यायालय ऐसा निर्सणय दे सकता था और कई मामलों में ऐसा हुआ है।

इसलिए, सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय स्वागतयोग्य है, जो न्यायपालिका और लोकतंत्र में लोगों के विश्वास को और मजबूत करेगा।

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