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दिल्ली कितनी दूर ? कितनी पास ?

दिल्ली में कांग्रेसका प्रभाव लगभग खत्म हो गया है इसलिए मैदान में सिर्फ दो ही पार्टियां हैं भाजपा और आप। वर्तमान में आप की सरकार है जो पिछले 5 साल से चल रही है और जिसने 5 साल पहले 70 में से 67 सीट जीतकर अभूतपूर्व बहुमत प्राप्त किया था । सरकार की शुरुआत के दिनों में अपने अनुभव हीनता और अत्यावश्यक चालाकी कारण केजरीवाल कोई भी काम करने में असमर्थ रहे और अपनी असफलता का ठीकरा मोदी के सर फोड़ते रहे। केजरीवाल को यह समझने में बहुत समय लगा कि मोदी से टकराने का कोई फायदा नहीं होने वाला है और तब जाकर उन्होंने थोड़ा बहुत काम करना शुरू किया। फिर भी जो भी उन्होंने काम किए हैं वह समाज के निचले तबके के लिए काफी फायदेमंद दिखाई पड़ते हैं। दिल्ली में उत्तर भारत व अन्य राज्यों से आए हुए बहुत गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय लोग रोजगार की तलाश में आते हैं और यहां झुग्गी झोपड़ी जैसी अनधिकृत कॉलोनियों में रहते हैं जिनमें बिजली पानी और सीवर की समस्या है। इनमें से कई कॉलोनी को केंद्र सरकार द्वारा नियमित कर दिया गया है फिर भी इसका श्रेय लेने में केजरीवाल पीछे नहीं रहे। केजरीवाल बहुत ही चालाक और शातिर राजनीतिक व्यक्ति हैं । इन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत अन्ना हजारे के आंदोलन से की और उन्हें धता बताते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए। उन्होंने एक-एक कर अपने उन सभी साथियों को पार्टी से बाहर कर दिया जिनसे उन्हें और उनकी लोकप्रियता को खतरा हो सकता था और भविष्य में उनके लिए चुनौती खड़ी हो सकती थी। इस समय उनके पास उपमुख्यमंत्री और मंत्रियों के रूप में उनके अनुयायियों की बड़ी संख्या है जिनसे उन्हें पद और प्रतिष्ठा के लिए कोई खतरा नहीं है। केजरीवाल ने समाज के निचले तबके को खुश करने के लिए बहुत से काम किए हैं उनमें से मोहल्ला क्लीनिक, बिजली और पानी के बिल में अनुदान और हाल ही में महिलाओं को मेट्रो में मुफ्त सफर जैसी योजनाएं शामिल है। एक ऐसा वर्ग है दिल्ली में जिनमें बड़ी संख्या में ऑटो और टैक्सी के ड्राइवर है, ई रिक्शा चालक है , उनको लगभग हर साल वह उपकृत करते हैं और वह भी इस तरह से जिसे कोई बमुश्किल ही समझ सकता है और वह है ऑ़ड और एवन फार्मूला जिसे लगभग घर साल सर्दियों के मौसम में प्रदूषण बढ़ने के कारण करते हैं सड़को पर करों की संख्या कम हो जाती हैं लेकिन टैक्सी और ऑटो चलते रहते हैं। हुआ न फायदा। चुनाव में भी उनकी अभूतपूर्व सफलता में इन ई रिक्शा और ऑटो ड्राइवर का बहुत बड़ा हाथ था जो अपने ऑटो और टैक्सी के पीछे उनके बैनर लगाकर चलते थे और लोगों से आप को वोट देने की अपील करते थे। समाज के निचले तबके में समर्थन के बावजूद आप का जादू अब वैसा नहीं रहा लेकिन बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया है और CAA पर आंदोलन का केंद्र दिल्ली बन गया जामिया से जेएनयू तक हिन्दू मुस्लिम का संप्रदायिक वातावरण बन गया । अब मुस्लिम थोक में वोट करेंगे । किसे ? जो भाजपा को हराने की क्षमता रखता हो। वह कौन पार्टी हो सकती है? कांग्रेस तो नहीं क्योंकि दिल्ली में उसका कोई आधार नहीं बचा । तो ये आप पार्टी हो सकती है और केजरीवाल ने दिल्ली में कई मस्जिद बनवाई , मौलवियों को वेतन भत्ते दिए और तो और दिल्ली विधानसभा हेतु सबसे अधिक टिकट मुसलमानों को दिए। निश्चित रूप से इस तरह की एक तरफा वोटों का फायदा आप पार्टी को होगा और उसका पलड़ा भारी होगा। भाजपा ने दिल्ली में कहीं काम की है और कई तोहफे जनता को दिए हैं उनमें अनधिकृत कालोनियों को नियमित किया जाना अनेकों फ्लाईओवर बनाना और दिल्ली विकास प्राधिकरण के माध्यम से प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत आवास उपलब्ध कराना आदि शामिल है लेकिन फिर भी वह दिल्ली में जनता के लिए मुख्यमंत्री के रूप में एक अच्छा और निर्विवाद चेहरा देने में विफल रही है । इसका खामियाजा उसे इन विधानसभा चुनाव में भुगतना पड़ेगा क्योंकि राज्य के चुनाव सिर्फ मोदी और अमित शाह के बदौलत नहीं जीते जा सकते।
राजनीतिक संभावनाओं का खेल है और अभी भी इतना समय बाकी है कि कुछ भी उलटफेर हो सकता है।। आज की स्थिति यह है कि दिल्ली में कांग्रेश के लिए अपना अस्तित्व बचाना मुश्किल होगा भारतीय जनता पार्टी और आप पार्टी की सीधी टक्कर होगी और इस द्वंद युद्ध में आप पार्टी का पलड़ा काफी भारी है।
दिल्ली के संसदीय और विधानसभा चुनाव की एक बहुत ही दिलचस्प दास्तान है । लोकसभा चुनाव में 2009 में जहां कांग्रेस ने सभी 7 सीटें जीतकर अपना परचम लहराया था । 2008 में हुए विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने जीत हासिल की थी और उसे 43 सीट मिली थी । उसने शीला दीक्षित के नेतृत्व में सरकार बनाई थी। भारतीय जनता पार्टी ने 23 सीटें विधानसभा में जीती थी और उसे 36% से भी अधिक मत प्राप्त हुए थे किंतु यह कांग्रेस की तुलना में 4% कम थे। 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने पहली बार दिल्ली विधानसभा के चुनाव लड़े और इस त्रिकोणीय संघर्ष में भारतीय जनता पार्टी की सीट बढ़कर 31 हो गई और उसके बाद आम आदमी पार्टी को 28 सीटें प्राप्त हुई थी कांग्रेश केवल 8 सीटें जीतने में कामयाब रही थी । इन चुनावों में यद्यपि भारतीय जनता पार्टी की सीट संख्या बढ़कर 31 हो गई थी और वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी लेकिन उसका वोट प्रतिशत घटकर 33% के आसपास आ गया था । उसे कड़ी टक्कर देते हुए आम आदमी पार्टी ने पहली बार चुनाव में भाग लेते हुए 30% के लगभग मत प्राप्त किए थे। इसका सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेश को उठाना पड़ा जो केवल 24% मत पाकर सिर्फ 8 सीटें जीत सकी थी। इस त्रिशंकु विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी को वांछित 36 सीटें उपलब्ध नहीं थी इसलिए उसने अपनी रणनीति के तहत सरकार बनाने से मना कर दिया क्योंकि उसका मानना था कि अगर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बनाई तो जनता को सीधा संदेश जाएगा कि दोनों पार्टियां एक ही है और क्योंकि सरकार बहुत अधिक समय नहीं चल पाएगी इसलिए आगे भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने आप बन जाएगी। इस प्रकार दूसरे स्थान पर रही आम आदमी पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिला और उसे कांग्रेश ने बाहर से बिना शर्त समर्थन देने का वचन दिया था। यह सरकार बहुत समय तक नहीं चल सकी । 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दिल्ली की 7 की सातों सीटें जीती और उन्हें 46% से भी अधिक मत प्राप्त हुए। लोकसभा चुनाव के कुछ समय बाद ही दिल्ली विधानसभा के मध्य अवधि चुनाव हुए और भारतीय जनता पार्टी को इन चुनावों से बेहद आशा थी कि चुनाव परिणाम लोकसभा चुनाव परिणाम की भांति ही आएंगे किंतु इन चुनावों में बहुत बड़ा उलटफेर हुआ । आम आदमी पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली । उस ने 70 में से 67 सीटें जीतकर एक नया कीर्तिमान बनाया। भारतीय जनता पार्टी को केवल 3 सीटें प्राप्त हो सकी। 2019 में हुए लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने फिर अपनी सफलता दोहराते हुए अपने पिछले रिकॉर्ड में अत्यधिक सुधार करते हुए न केवल 7 में 7 सीटें जीती वरन अपना मत प्रतिशत 46% से बढ़ाकर 56% से भी अधिक पर पहुंचा दिया। यह एक बड़ा कीर्तिमान है और अगर लोकसभा के चुनाव को एक संकेत माना जाए तो निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी की सरकार बननी चाहिए किंतु चुनाव का विशेषण और जमीनी हकीकत कुछ अलग है । हाल ही में हुए सर्वे और पिछले कई चुनावों की विश्लेषण यह बताते हैं दिल्ली के मतदाता बहुत ही प्रबुद्ध किस्म के मतदाता हैं जिन्हें यह भलीभांति मालूम है कि राष्ट्रीय सरकार बनाने के लिए किसे मौका देना है और राज्य में सरकार बनाने के लिए किसे मौका देना है। इसके अलावा एक और बात है लोकसभा का क्षेत्र काफी बड़ा होता है और एक लोकसभा के चुनाव में औसतन 10 विधानसभा की सीटें आती हैं इसलिए चुनाव क्षेत्र छोटा हो जाता है और यहां पर विभिन्न तरह के समीकरण काम कर जाते हैं और उससे थोड़े से मतों के अंतर से हार जीत हो जाती है। इस विधानसभा चुनाव में पिछले लोकसभा के चुनाव की तरह ही कांग्रेश की स्थिति अत्यधिक खराब है ।कांग्रेश की खराब स्थिति भारतीय जनता पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। ऐसे मतदाता खासतौर से मुस्लिम मतदाता जो कांग्रेस को वोट करते थे अब बदले हुए माहौल में एक विशेष रणनीति के तहत आप पार्टी को वोट करेंगे। देश के अन्य हिस्सों में भी देखा गया है कि सामान्य तौर से मुस्लिम मतदाता उसी पार्टी को वोट करते हैं जो भारतीय जनता पार्टी को हराने की क्षमता रखता हो और क्योंकि वर्तमान समय में कांग्रेसका कोई अस्तित्व नहीं है इसलिए कोई अन्य विकल्प न होने के कारण यह मत आम आदमी पार्टी के खाते में जाएंगे । इसलिए आम आदमी पार्टी का पलड़ा भारी हो जाता है । फिर भी मुकाबला बहुत दिलचस्प है। भाजपा और आम आदमी पार्टी में किसकी सरकार बनती है यह तो निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता लेकिन एक बात बिल्कुल निश्चित है कांग्रेश की दुर्गति होनी एकदम से तय है इसमें किसी तरह का कोई भी संदेह नहीं है।

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