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संदेश

CAA विरोध प्रदर्शन : मुस्लिम महिलाओं को हथियार की तरह क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है ?

कई राज्यों में के साथ हिंसात्मक विरोध प्रदर्शनों के बाद अब CAA विरोधियों ने प्रदर्शन का तरीका बदल दिया है और यह अनायास नहीं हुआ है ।एक सोची-समझी रणनीति है या यूं कहिए कि बहुत बड़ी साजिश है। संशोधित नागरिक संहिता के विरोध में प्रदर्शनों की शुरुआत जामिया से हुई और जेएनयू होते हुए जादवपुर तक पहुंच गई पश्चिम बंगाल में हिंसा का भयानक तांडव देखने को मिला जहां पर सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया और व्यक्तिगत वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया गया । इसके बाद उत्तर प्रदेश को जलाने की पूरी कोशिश की गई लेकिन समय रहते सुरक्षा एजेंसियों को यह पता चल गया कि इसके पीछे कुछ फिरका परस्त और आतंकवादी ताकते भी शामिल हो रही हैं जिसके बाद उत्तर प्रदेश में बहुत सख्ती बढ़ती गई । साथ ही साथ मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि जिस सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान जो दंगाई कर रहे हैं उसे दंगाइयों को पहचान कर उनसे ही वसूल किया जाएगा। उत्तर प्रदेश ने इस मामले में सूचना प्रौद्योगिकी का भी सहारा लिया जिसके बहुत ही अच्छे परिणाम आए। कई मामलों में वसूली नोटिस चस्पा किए गए और कुछ मामलों में वसूली हो भी गई ।उत्तर प्रदेश मे...

डेमोक्रेसी इंडेक्स (Democracy Index) 2019

ब्रिटेन से निकलने वाले इकोनॉमिस्ट न्यूज़पेपर ग्रुप ने वर्ष  2006  में लोकतंत्र मापने का पैमाना विकसित करने के उद्देश्य से एक प्रणाली / अवधारणा विकसित की और इसका नाम दिया गया "डेमोक्रेसी इंडेक्स" यह काम न्यूज़पेपर ग्रुप की इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट हर वर्ष करती है.इस सर्वे में दुनिया भर के  167  देशों को शामिल किया जाता है और  1 से  10  अंकों वाले इस इंडेक्स मैं हर देश को मिलने वाले अंको के आधार पर इन देशों की संयुक्त सूची तैयार की जाती है जिससे तुलनात्मक पता चल सके कि किस देश में लोकतंत्र के क्या स्थिति है।  2018  की तुलना में  2019  में भारत की स्कोर तालिका में  33  बेसिस प्वाइंट्स की कमी आई है और यह  7.23  से घटकर  6.90  हो गया है और इसके कारण सूची में भारत का स्थान  41  वीं पोजीशन से गिरकर  51 वी पोजीशन पर आ गया है। ऐसा क्यों हुआ  ?  इसको समझने के लिए इंडेक्स की कार्यप्रणाली समझना आवश्यक है. लोकतांत्रिक इंडेक्स में  60  संकेतको के आधार पर एक प्रश्नावली बनाई गई ह...

दिल्ली कितनी दूर ? कितनी पास ?

दिल्ली में कांग्रेसका प्रभाव लगभग खत्म हो गया है इसलिए मैदान में सिर्फ दो ही पार्टियां हैं भाजपा और आप। वर्तमान में आप की सरकार है जो पिछले 5 साल से चल रही है और जिसने 5 साल पहले 70 में से 67 सीट जीतकर अभूतपूर्व बहुमत प्राप्त किया था । सरकार की शुरुआत के दिनों में अपने अनुभव हीनता और अत्यावश्यक चालाकी कारण केजरीवाल कोई भी काम करने में असमर्थ रहे और अपनी असफलता का ठीकरा मोदी के सर फोड़ते रहे। केजरीवाल को यह समझने में बहुत समय लगा कि मोदी से टकराने का कोई फायदा नहीं होने वाला है और तब जाकर उन्होंने थोड़ा बहुत काम करना शुरू किया। फिर भी जो भी उन्होंने काम किए हैं वह समाज के निचले तबके के लिए काफी फायदेमंद दिखाई पड़ते हैं। दिल्ली में उत्तर भारत व अन्य राज्यों से आए हुए बहुत गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय लोग रोजगार की तलाश में आते हैं और यहां झुग्गी झोपड़ी जैसी अनधिकृत कॉलोनियों में रहते हैं जिनमें बिजली पानी और सीवर की समस्या है। इनमें से कई कॉलोनी को केंद्र सरकार द्वारा नियमित कर दिया गया है फिर भी इसका श्रेय लेने में केजरीवाल पीछे नहीं रहे। केजरीवाल बहुत ही चालाक और शातिर राजनीतिक व्यक्त...

क्या रघुवर दास झारखंड में भाजपा की हार के लिए जिम्मेदार हैं ?

लगभग सही बात है कि झारखंड में बीजेपी के चुनाव हार जाने का सबसे बड़ा कारण वहां के मुख्यमंत्री रघुवर दास है. लेकिन चुनावी हार का केवल एक कारण नहीं होता । अन्य इस प्रकार हैं - झारखंड का निर्माण इस उद्देश्य को लेकर किया गया था कि बिहार से अलग होने के बाद आदिवासी बहुल इस राज्य का विकास बहुत तेजी से हो सकेगा।  एक ऐसा राज्य जिसमें प्राकृतिक संपदा की कमी नहीं है उसके विकास में किसी चीज की कोई कमी आड़े आएगी इसकी संभावना नहीं थीं । झारखंड के निर्माण के शुरुआती दिनों से ही अस्थिरता का दौर शुरू हुआ और कोई भी दल अपने दम पर सरकार नहीं बना सका। पिछली सरकार के निर्माण के समय भारतीय जनता पार्टी को 80 में से 37 सीट से मिली हुई थी और उसने आजसू और जेवीएम की मदद से सरकार बनाई और पूरे 5 साल तक विकास के अनेकों कार्य किए। लेकिन चूंकि रघुवर दास एक गैर आदिवासी व्यक्ति थे इसलिए उनकी स्वीकार्यता आदिवासी समुदाय में नहीं हो पाई और यह शायद ये सबसे बड़ी कमी शुरुआत से ही थी जिसे भाजपा आखिर समय तक पूरा नहीं कर सकी ।  मुख्यमंत्री का व्यौहार अपने पार्टी के कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के प्रति बहुत संव...

गुलजार जी आप सही नहीं है,

कोई भी व्यक्ति हर समय हर विषय पर सही राय नहीं दे सकता और बहुत स्वाभाविक है उसकी अपनी राय भी हमेशा सही नहीं हो सकती। हाल ही में मुंबई में हुए एक समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर बोलते हुए गुलजार ने बातों ही बातों में नए  नागरिकता संशोधन कानून के विषय में भय की भावना का इजहार किया और केंद्र सरकार पर तंज कसा। लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मैं अपनी बात "मित्रों" करके करना चाहता था लेकिन मैंने अपने को रोक लिया। "मित्रों" का संबोधन  मोदी जी से टैग किया जाता है और इसलिए संभवत: उन्होंने इस शब्द को स्तेमाल नहीं किया, इसलिए क्योंकि मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने इस कानून को बनाया है।  गुलजार ने   ऐसे विषयों पर कभी कोई अनावश्यक टिप्पणी नहीं की जिनमें उनके समकालीन जावेद अख्तर सरीखे कई लोगों ने टिप्पणियां करके अनावश्यक विवाद को जन्म दिया । लेकिन नागरिकता संशोधन कानून पर अपनी अप्रत्यक्ष असहमति व्यक्त कर  गुलजार ने संभवत: अपनी ही परंपरा तोड़ दी है।   नागरिकता संशोधन कानून के विरुद्ध आंदोलन करने वाले ज्यादातर यह तर्क देते हैं कि यह कानून मुस...

झारखंड चुनाव के संदेश

झारखंड से प्राप्त चुनाव के रुझान से आभास हो रहा है कि  भारतीय जनता पार्टी पिछले चुनाव के अपने प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाएगी। पिछली बार उसे 37 सीटें विधानसभा में प्राप्त हुईं थीं और अब की बार ऐसा लग रहा है कि ये  आंकड़ा  30 से आगे नहीं बढ़ पाएगा. बहुत स्पष्ट है कि यह भारतीय जनता पार्टी की नैतिक पराजय है और वह जोड़ तोड़ कर सरकार भले ही बना ले जिसकी संभावना भी कम लग रही है क्योंकि उसके पूर्व सहयोगी आजसू और झारखंड विकास मोर्चा को मिलाकर  भी इतनी सीटें नहीं मिल पा रही हैं जिससे सरकार बनाना संभव हो। चुनावों से से बहुत पहले आगाज हो गया था कि झारखंड में भाजपा सत्ता में वापसी नहीं कर पाएगी औr कारण भी स्पष्ट थे और भारतीय जनता पार्टी को शीर्ष नेतृत्व को यह कारण मालूम भी होंगे लेकिन इसके बाद भी कोई कदम नहीं उठाया गया तो यह आश्चर्यचकित करने वाला है। भाजपा अगर सिर्फ वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास को हटाकर किसी अन्य व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना देती तो भी संभावित नुकसान को रोका जा सकता था लेकिन भाजपा ने ऐसा नहीं किया। भाजपा की हार के कारण 1. 2014 के चुनाव में भारतीय जनता पा...

नागरिकता संशोधन कानून पर दुर्भाग्य पूर्ण राजनीति

यह बहुत दुर्भाग्य पूर्ण है कि बार बार स्पष्टीकरण के वाबजूद ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि नागरिकता संशोधन कानून से अल्पसंख्यको की नागरिकता छिन जायेगी . परिणाम स्वरूप जगह जगह अल्पसंख्यको के एक बहुत छोटे से वर्ग द्वारा जो पहले से ही तीन तलाक, अयोध्या निर्णय, धारा ३७० आदि की वजह से हासिये पर आ गया है और उनके आय के श्रोत प्रभावित हो गए हैं , प्रदर्शन और हिंसा को भड़काने का काम कर रहे हैं . पूर्वोत्तर में प्रधान मंत्री के आह्वाहन पर शांति कायम होती दिख रही है किन्तु इसके विपरीत पश्चिम बंगाल और दिल्ली में हिंसा और आगजनी बढ़ती जा रही है . दुर्भाग्य से ये दोनों ही राज्यों में निकट भविष्य में चुनाव होने वाले हैं इसलिए वोटो की फसल को एकमुश्त काटने के लिए कुछ राजनैतिक दलों के बीच प्रतियोगिता भी शुरू हो गयी है. दिल्ली में जामिया इलाके में प्रदर्शन हिंसक हो गया और कई बसों और सार्वजानिक संपत्ति को आग के हवाले कर दिया गया और पुलिस बालों पर पथराव किया गया . एक राजनैतिक दल के विधान सभा सदस्य का भडकाने वाला विडिओ सामने आया है . समय की मांग है कि प्रदर्शनों को सख्ती से निपटा जाय ...