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क्या आँखों का देखा हमेशा सच ही होता है ?

आंखों का काम केवल देखना है और उसकी सूचना मस्तिष्क को देना है. मस्तिष्क उस विषय पर अंतिम निर्णय लेता है. आंखों के देखने में, माध्यम की बड़ी भूमिका होती है, जिसके परिवर्तित होने से सूचना भी परिवर्तित हो सकती है, और इस तरह मस्तिष्क भी उस सूचना पर गलत निर्णय ले सकता है. एक पौराणिक कथा के माध्यम से इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है. एक पंडित रामदास थे, जो राम कथा लोगों को सुनाते थे और वे स्वयं भी राम के अनन्य भक्त थे. उनकी कथा बहुत ही रोचक और रामकथा का सजीव चित्रण हुआ करती थी, इसलिए वह बहुत प्रसिद्ध थे और दूर-दूर से लोग उनकी कथा सुनने आते थे. पूरे ब्रह्मांड में हनुमान जी से बड़ा कोई भी राम भक्त नहीं है और इसलिए आज भी जहां कहीं रामकथा होती है, वहां हनुमान जी निश्चित रूप से पहुंचते हैं. हनुमान जी के बारे में कहा जाता है  "राम कथा सुनने को रसिया राम लखन सीता मन बसिया". पंडित राम दास की कथा सुनने भी हनुमान जी भी रोज भेष बदलकर पहुंचते थे. एक दिन रामदास की कथा में अशोक वाटिका का प्रसंग आया जब हनुमान जी सीता को खोजते हुए पहुंचे थे. हनुमान जी बहुत खुश हुए और जब पंडित जी ने हनुमान के अशोक वाटिक...

भारत का पीके क्या अब तुर्की का आमिर हो गया ?

आमिर खान इस समय अपनी फिल्म लाल सिंह चड्ढा की शूटिंग इस्तांबुल में कर रहे हैं . मुझे तो अभी भी समझ में नहीं आ रहा है कि लाल सिंह चड्ढा का तुर्की से क्या संबंध है और इस फिल्म की शूटिंग टर्की में ही होनी क्यों जरूरी है ? जो भी हो बॉलीवुड के कुछ लोग विशेषतया, भारत में असहिष्णुता का आरोप लगाने वाले लोग प्राय: अपनी फिल्मों की शूटिंग इस्तांबुल में करते हैं, और हिन्दुतान इसे सहिष्णुता से नजरंदाज करता रहता है। आमिर खान ने इस्तांबुल में वहां राष्ट्रपति की पत्नी इमीन एरडोगन से १५ अगस्त २०२० को मुलाकात की जिस की फोटो उन्होंने सोशल मीडिया पर शेयर की है, भारत में जिस का जमकर विरोध हो रहा है। आमिर की ये हरकत बेहद निंदनीय और पूरे देशको शर्मशार करने वाली है, इसलिए उसका विरोध बिलकुल सही है. यह वही आमिर खान हैं जिन्होंने 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कहा था कि भारत में असहिष्णुता बढ़ रही है और उन्हें और उनकी पत्नी को यहां डर लगता है तुर्की का रुख भारत के लिए कभी भी दोस्ताना नहीं रहा. तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोगन ने जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाने के विरोध में संयुक्त राष्ट्र संघ में न...

योगी आदित्य नाथ के कपड़े, कुर्सी का कवर भी, भगवा क्यों ?

सनातन धर्म में रंगों की पहचान और महत्ता वैदिक काल में ही कर ली गई थी. विभिन्न रंगों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखते हुए सनातन काल से रंगों का प्रयोग किया जाता रहा है. भगवा रंग मूल प्राकृतिक रंग नहीं है बल्कि यह लाल और पीले रंग का मिश्रण है क्योंकि यह दोनों ही रंग मनोवैज्ञानिक रूप से अत्यंत प्रभावी हैं , इसलिए भगवा रंग सनातन संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन गया. भगवा रंग लाल और पीले दो प्राकृतिक रंगों से मिलकर बना है जिनका अलग-अलग महत्व है. जहां लाल रंग सौभाग्य, उत्साह और उमंग का प्रतीक है, पीला रंग रोशनी का प्रतीक है और यह सूर्य, मंगल और देवताओं के गुरु बृहस्पति का प्रतिनिधित्व करता है. दोनों रंगों का अत्यंत वैज्ञानिक महत्व है. लाल और पीले दोनों रंग मिलकर अग्नि का रंग बनाते हैं जिसे सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र स्थान दिया गया है. सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों ही भगवा रंग के होते हैं, यह जीवन की शुरुआत और जीवन का अंत दोनों ही भगवा समर्पित हैं . सनातन धर्म के अनुसार भगवा रंग शौर्य और पराक्रम का भी प्रतीक है इसलिए आदि काल से भगवा रंग का प्रयोग धर्म ध्वजा के रूप में भी किया जाता ह...