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शाहीन बाग का झूठ

सबसे बड़ा झूठ शाहीन बाग का का सबसे बड़ा झूठ है कि यह धरना, प्रदर्शन, आंदोलन संशोधित नागरिक कानून और एनआरसी के विरुद्ध है और यह मुस्लिम महिलाओं द्वारा स्वत: स्फूर्त संचालित है. इसका जेएनयू जामिया और एएमयू से कोई लेना देना नहीं है.आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का इससे दूर दूर का कोई रिश्ता नही। शाहीन बाग का केवल झूठ जानने से स्थित स्पष्ट नहीं होती इसलिए ये भी जानिए कि इसका सच क्या है ? शाहीन बाग का सच शाहीन बाग का सच यह है कि इसका एकमात्र उदेश्य आम आदमी पार्टी को चुनाव में जीत सुनिश्चित करना था और इसकी पूरी योजना का खाका अरिन्द केजरीवाल को रणनीतिक सलाह देने वाले प्रशान्त किशोर ने बनाया था और इसका सञ्चालन फिरोजशाह कोटला रोड पर आप के वॉर रूम से किया जा रहा था . कांग्रेस भी मुश्लिम वोट मिलने की खुशफहमी का शिकार हुयी जबकि इसका उद्देश्य उसका वोट बैंक भी लूट कर आम आदमी पार्टी को देना था. सब कुछ बहुत योजना वद्ध तरीके से हुआ. शायद इतिहास में पहलीवार हिन्दुओं का ध्रुवीकरण रोकते हुए ,जमकर मुश्लिम धुर्वीकरण किया गया। वास्तव में ये एक नायाब प्रयोग था। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का ये क...

दिल्ली में भाजपा की हार के सबक

दिल्ली चुनाव में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली है   यद्दपि   उसका वोट प्रतिशत बढ़ा है और सीटों की संख्या भी तीन से बढ़कर 8 हो गई है । लेकिन यह संतोष का विषय नहीं   हो सकता है क्योंकि जिस तरह से दिल्ली के सभी सातों सांसदों, तीनों विधायकों , भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा,और   अमित शाह से लेकर प्रधानमंत्री तक ने   जितनी मेहनत की थी उसका प्रतिफल नहीं मिला है । इसकी बानगी ओपिनियन पोल के समय ही मिल चुकी थी कि   दिल्ली में एक बार फिर आम आदमी पार्टी सरकार बनाएगी और भारतीय जनता पार्टी तमाम कोशिशों के बाद भी 20 सीटों की संख्या के अंदर से सिमट जाएगी. पार्टीं ने शायद इसके बाद ही गंभीरता से प्रयास शुरू किये पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी .   अब नतीजे सामने है और वह तमाम कारण जिसकी वजह से अपेक्षित सफलता नहीं मिली उसके सबक, कारण   और सुझाव निम्न है- ·        चुनाव से पहले संबंधित राज्य का सर्वे कराना और यह जानना की जनता के समक्ष प्रमुख समस्याएं क्या है ?और ज्वलंत मुद्दे क्या है ? इससे पार्टी को यदि वह सत्ता में है, तो   समय...

क्या आम जनता की उपेक्षा भाजपा की हार का कारण बना ?

भाजपा की हार तो हुई ही नही क्योकि वह सत्ता में नही थी। हारता वही है जो पहले जीता हो । हां भाजपा जीत नही सकी या आप को हरा नहीं सकी। ये दिनरात चिल्लाने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का स्टेटमेंट है जहां पढ़े लिखे समझदार पत्रकारों की संख्या लगातार घटती जा रही हैं। दिल्ली में भाजपा पिछले 25 सालों से सत्ता से बाहर है किंतु लगातार जीतने का भरपूर प्रयास कर रही है। आप के पहले यानी 7 साल पहले तक कांग्रेस की सरकार थी जो लगातार 15 वर्षों तक रही , और कांग्रेस भी मैदान में है सिर्फ उपस्थिति दर्ज करने के लिये । अब विश्लेषण करते हैं भाजपा के जीत ना पाने के कारणों का जो मुख्यतः निम्न है दिल्ली की जनता मतदान करने के मामले में शायद काफी परिपक्व है किस चुनाव में किसे वोट देना है इसकी कला शायद देश में सबसे अधिक दिल्ली की जनता को आती है इसलिए 6 सालों में हुए दो लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली की सभी 7 सीटों पर विजय प्राप्त की और यही नहीं नगर निगम के चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी ने विजय श्री प्राप्त की लेकिन पिछले 7 सालों में विधानसभा के हुए 3 चुनाव में भारतीय जनता पार्टी जीत नहीं सकी। आ...

जेएनयू से एएमयू और जामिया से जाधवपुर तक

जेएनयू में हुई हिंसा के लिए केंद्रीय गृहमंत्री , प्रधानमंत्री या केंद्र सरकार को दोष देना कितना उचित है इसका निर्णय आप मेरा लेख पढ़ने के बाद करेंगे तो मेहरबानी होगी। सबसे पहले इस बात पर विचार करना चाहिए कि जेएनयू में हिंसा क्यों हुई ? हिंसा के पीछे क्या संभावित कारण हो सकते हैं ? क्या इस हिंसा का सम्बन्ध जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से है ? संशोधित नागरिक अधिनियम के खिलाफ दिल्ली में सबसे पहले प्रदर्शन जामिया में किए गए और इसने कुछ भी असामान्य नहीं क्योंकि हिंदुस्तान एक लोकतांत्रिक देश है और यहां विरोध करना संविधान प्रदत्त अधिकार है लेकिन अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का निर्वाहन भी बहुत जरूरी है। इसके पहले भी जामिया आतंकवादियों के मुठभेड़ के मामले में काफी चर्चा में रहा था और उसमें भी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता वादी और लोकतंत्र की रक्षा करने के नाम पर तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों ने बहुत ही घड़ियाली आंसू बहाए थे और मुठभेड़ में एक शहीद पुलिस अधिकारी के विरुद्ध भी आरोप गढ़े गए थे। एक राष्ट्रीय पार्टी की तत्कालीन अध्यक्ष भी बिलख बिलख कर रोयी थी। जामिया में CAA के विरुद्ध हुए प्...

सियासी पारा : दिल्ली २०२०

दिल्ली के विधानसभा चुनाव बहुत ही रहस्य और रोमांच से भरे हुए हैं। एक महीने पहले की स्थिति केजरीवाल के तरफ झुकी हुई थी और उसका सबसे बड़ा कारण बिजली और पानी के बिलों में रियायत था । स्पष्ट है कि इसमें विकास की गाथा या भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन जैसा कुछ भी नहीं है। वास्तव में अन्ना आंदोलन से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले केजरीवाल सिर्फ इस आधार पर दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे कि वे पारदर्शिता लाएंगे और भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंक देंगे लेकिन ऐसा कुछ भी हुआ नहीं। उनके कई मंत्रियों को भ्रष्टाचार के कारण इस्तीफा देना पड़ा । उनके एक बहुत नजदीकी रिश्तेदार को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया है केजरीवाल सरकार ने निर्माण का ठेका दिया था। उनके निजी सचिव के ऑफिस और आवास पर छापे मारे गए उसमें भी काफी आपत्तिजनक चीजें निकली । इन सबसे कम से कम एक बात तो साफ है कि जिस बुनियाद पर केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाई थी और जिस तरह की नई राजनीति जिसमें सुचिता , पारदर्शिता और ईमानदारी हो, कम से कम वह तो परवान नहीं चढ़ सकी । ऑटो रिक्शा , साइकिल और मारुति ...

CAA विरोध प्रदर्शन : मुस्लिम महिलाओं को हथियार की तरह क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है ?

कई राज्यों में के साथ हिंसात्मक विरोध प्रदर्शनों के बाद अब CAA विरोधियों ने प्रदर्शन का तरीका बदल दिया है और यह अनायास नहीं हुआ है ।एक सोची-समझी रणनीति है या यूं कहिए कि बहुत बड़ी साजिश है। संशोधित नागरिक संहिता के विरोध में प्रदर्शनों की शुरुआत जामिया से हुई और जेएनयू होते हुए जादवपुर तक पहुंच गई पश्चिम बंगाल में हिंसा का भयानक तांडव देखने को मिला जहां पर सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया और व्यक्तिगत वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया गया । इसके बाद उत्तर प्रदेश को जलाने की पूरी कोशिश की गई लेकिन समय रहते सुरक्षा एजेंसियों को यह पता चल गया कि इसके पीछे कुछ फिरका परस्त और आतंकवादी ताकते भी शामिल हो रही हैं जिसके बाद उत्तर प्रदेश में बहुत सख्ती बढ़ती गई । साथ ही साथ मुख्यमंत्री ने ऐलान किया कि जिस सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान जो दंगाई कर रहे हैं उसे दंगाइयों को पहचान कर उनसे ही वसूल किया जाएगा। उत्तर प्रदेश ने इस मामले में सूचना प्रौद्योगिकी का भी सहारा लिया जिसके बहुत ही अच्छे परिणाम आए। कई मामलों में वसूली नोटिस चस्पा किए गए और कुछ मामलों में वसूली हो भी गई ।उत्तर प्रदेश मे...

डेमोक्रेसी इंडेक्स (Democracy Index) 2019

ब्रिटेन से निकलने वाले इकोनॉमिस्ट न्यूज़पेपर ग्रुप ने वर्ष  2006  में लोकतंत्र मापने का पैमाना विकसित करने के उद्देश्य से एक प्रणाली / अवधारणा विकसित की और इसका नाम दिया गया "डेमोक्रेसी इंडेक्स" यह काम न्यूज़पेपर ग्रुप की इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट हर वर्ष करती है.इस सर्वे में दुनिया भर के  167  देशों को शामिल किया जाता है और  1 से  10  अंकों वाले इस इंडेक्स मैं हर देश को मिलने वाले अंको के आधार पर इन देशों की संयुक्त सूची तैयार की जाती है जिससे तुलनात्मक पता चल सके कि किस देश में लोकतंत्र के क्या स्थिति है।  2018  की तुलना में  2019  में भारत की स्कोर तालिका में  33  बेसिस प्वाइंट्स की कमी आई है और यह  7.23  से घटकर  6.90  हो गया है और इसके कारण सूची में भारत का स्थान  41  वीं पोजीशन से गिरकर  51 वी पोजीशन पर आ गया है। ऐसा क्यों हुआ  ?  इसको समझने के लिए इंडेक्स की कार्यप्रणाली समझना आवश्यक है. लोकतांत्रिक इंडेक्स में  60  संकेतको के आधार पर एक प्रश्नावली बनाई गई ह...