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पितृ-सत्ता

  विनय गुप्ता किदवई नगर  के  अपने छोटे से घर की  की बालकनी में बैठे हुए थे. रोज सुबह यहां बैठकर चाय पीते हुए समाचार पत्र पढ़ना उनकी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा था , पर न जाने क्यों आज की सुबह एकदम अलग थी. चाय तिपाई पर रखी ठंडी हो चुकी थी. कुर्सी पर बैठे हुए उनके हाथों में समाचार पत्र ज्यों का त्यों  रखा था.  सामने हनुमान मंदिर की तरफ से आने वाली सड़क पर चलते हुए वाहन और लोग रोज की तरह आ जा रहे थे.सूर्य की रोशनी काफी फैल चुकी थी लेकिन फिर भी सुबह कुछ अलसाई सी थी ,  लेकिन उसकी  आँखे जैसे अनंत में टंकी हुई थी. निष्क्रिय सा वह न जाने कबसे इसी एक ही  मुद्रा में बैठा था ,  जिसका  उसे  शायद अहसास भी  नहीं था. जब उसकी तंद्रा टूटी तो उसे   लगा कि कानपुर का मौसम अचानक   बदल गया है. बरसात हो चुकी है , चारों तरफ पानी ही पानी है. सड़कें भीगी है , पेड़ पौधे भीगे हैं और आसपास   पानी पानी ही   दिख रहा है. सब कुछ पानी से तरबतर है.   कुछ भी साफ दिखाई नहीं पड़ रहा था. उसे आश्चर्य हुआ कि कानपुर के   मौसम में इतना...

जया बच्चन जी को समर्पित

  जया बच्चन जी को समर्पित तुम इतना क्यों तिलमिला रहे हो ? क्या राज है जो छुपा रहे हो? भैया हमारे थे तों शराबी, पान बनारस का खा रहें  हैं , भंग के रंग में घूम-घूम कर, ठुमके भी  खूब लगा रहें  हैं,  कौन है वे  जो ड्रग्स ले रहे हैं? तुम उनको क्योंकर  बचा रहे हो?....१. तुम्हारे दलदल के एक  नेता, जो जेल में चैन फरमा रहे हैं, रंग जांघिया  जयाप्रदा का , बता बता मुस्कुरा रहे हैं, छलनी  है ये  तुम्हारी  दुनिया, थाली जिसे तुम बता रहे हो ?  स्मृति ईरानी को भी नचनिया , बता दिया था वहीं किसी ने, तुम चुप रही जब कंगना को, हरामखोर बोला था  किसी ने, उचित नहीं  है संसद के सदन  से, तुम सबको क्यों  धमका रहे हो ?...३. नहीं रही वह अब फिल्मी दुनिया, ना  ही गुड्डी  न  चक्कू छुरिया, अब हैं पीके बजरंगी भाईजान, शान हो गया, माय नेम इज खान, कितना सहेगा अब और हिंदू, क्यों धर्म  मोहरा बना रहे हो ?...४. बने नास्तिक, शिकवा नहीं है , 786  प्रेम  पर अचरज नहीं   है , पूछती हैं खता क्या है राम लल...